महात्मा गांधी के आंदोलन

महात्मा गांधी के आंदोलन Thursday 19th of September 2019

महात्मा गांधी के आंदोलन और उससे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां।

महात्मा गांधी के आंदोलन


महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी है। महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में हुआ था। महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। महात्मा गांधी को शांति और अहिंसा के अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में माना जाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को पूरी दुनिया में उनके विशाल योगदान और कड़ी परिश्रम के लिए काफी प्रशंसा मिली है ।  इसीलिए ‘अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ महात्मा गांधी के जन्मदिवस पर मनाया जाता है। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का तृतीय चरण गांधी युग के नाम से जाना जाता है। 1915 ईस्वी में दक्षिण अफ्रीका से लौटकर मोहनदास करमचंद गांधी ने गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु बनाया।गांधी जी के भारत वापसी के समय प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था, गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार के युद्ध प्रयासों में सहायता प्रदान की जिसके फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने गाँधी जी को "कैसर ए हिंद" सम्मान से सम्मानित किया। गांधीजी ने भारत वापस आने पर 1915 ईस्वी में अहमदाबाद के समीप साबरमती नदी के तट पर "साबरमती आश्रम" स्थापित किया था। महात्मागाँधी जी ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए विभिन्न आंदोलनों का सहारा लिया था जो इसप्रकार हैं। 

Mahatma Gandhi's movement in Hindi

.1- चंपारण आंदोलन (1917)
2- खेड़ा आंदोलन (1918)
3- खिलाफत आंदोलन (1919)
4- असहयोग आंदोलन (1920)
5- भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
6- सविनय अवज्ञा आंदोलन: दांडी मार्च और गांधी-इरविन समझौता

चंपारण आंदोलन

Champaran movement in Hindi

महात्मा गांधीजी के देख रेख में बिहार के चम्पारण जिले में सन् 1917 में एक आंदोलन  हुआ जिसे चम्पारण आंदोलन के नाम से जाना जाता है। महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत में किया गया यह पहला प्रथम आंदोलन था।

जिस समय यह आंदोलन गांधी जी के नेतृत्व किया गया उस समय हजारों भूमिहीन मजदूर एवं गरीब किसान खाद्यान की जगह पर नकदी फसलों जैसे नील आदि की खेती करने के लिये मजबूर कर दिए गए थे। वहाँ पर नील की खेती करने वाले किसानों पर बहुत अत्याचार हो रहा था।और इन अत्याचारों के साथ साथ इन फसलों को बहुत ही कम कीमत पर बेच भी दिया जाता था। मौसम की बदहाल स्थिति और अधिक करों की वजह से भारतीय किसानों को अत्यधिक गरीबी का सामना करना पड़ रहा था। इसी के कारण किसानों की स्थिति बहुत ही दयनीय हो गई थी।

चंपारण आंदोलन से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

चंपारण में किसानों के इस तरह की  दयनीय स्थिति को सुनकर गांधी जी ने तुरंत इस जिले का दौरा किया। उनके दर्शन के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। 
किसानों ने अपनी सारी समस्याएँ और हो रहे अत्याचारों को गाँधी जी को बताईं। और दूसरी तरफ अंग्रेजी सत्ता भी हरकत में आ गई और पुलिस सुपरिटेंडंट ने गांधीजी को जिला छोड़ने का आदेश दे दिया। 
गांधीजी ने सुपरिटेंडं के इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया। और अगले दिन जब गांधीजी को कोर्ट में हाजिर करना था तब हजारों किसानों की भीड़ कोर्ट के बाहर खड़ी हो गयी । गांधीजी के समर्थन में तरह तरह के नारे लगाये जाने लगे । मेजिस्ट्रेट ने हालात की गंभीरता को देखते हुए बिना जमानत के गांधीजी को छोड़ने का आदेश दिया और फैसले को स्थगित कर दिया। परन्तु  गांधीजी कानून के अनुसार सजा की माँग करते रहे ।

गांधी जी के इस अभियान से अंग्रेजी सरकार परेशान हो उठी  और  मजबूर होकर एक जाँच आयोग नियुक्त की तथा गांधीजी को भी इस आयोग का सदस्य बनाया गया।इस तरह से कानून बनाकर सभी गलत प्रथाओं को समाप्त किया गया। इस तरह जमींदार के लाभ के लिए नील की खेती करने वाले किसान अब अपने जमीन के मालिक बने। गांधीजी ने भारत में सत्याग्रह की पहली विजय प्राप्त की। इस आंदोलन की सफलता से गांधी जी को महात्मा की उपाधि प्राप्त हुई।

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खेड़ा आंदोलन

खेड़ा आंदोलन (Kheda movement) सन् 1918 ई. में गुजरात राज्य के खेड़ा नामक जिले में शुरू हुआ था। गुजरात राज्य के खेड़ा नामक जिले में सूखा पड़ जाने के कारण किसानो की पूरी फसल बर्बाद हो गई थी। और फसल इतनी बर्बाद हो गई थी कि किसानों का पैदावार चौथाई से भी कम हो गया था। पैदावार की कमी के कारण किसानों की मंशा यह थी कि उनका लगान माफ कर दिया जाए, परंतु अंग्रेजी हुकूमत उनकी किसी भी बात को मानने को तैयार नहीं थी। और पूरा लगान वसूल करना चाहती थी। satyagraha in hindi 

खेड़ा जिला के किसानों और मजदूरों ने बहुत प्रार्थनाएं और विनतियाँ की परंतु उनकी सारी प्रार्थनाएं विफल रही। किसानों की जब सारी प्रार्थनाएँ निष्फल हो गई तब महात्मा गांधी ने उन्हें आंदोलन  करने का परामर्श दिया । गांधीजी के इस परामर्श  से बल्लभ भाई पटेल वकालत छोड़ कर इस आंदोलन में शामिल हो गए और गांव-गांव घूमकर किसानों से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर कराया और लोगों का मनोबल बढ़ाया कि हम किसी भी हाल में लगान देने को तैयार नहीं होंगे।  (Kheda movement)

अंग्रेजी हुकूमत ने किसानों की एकजुटता को देखकर भयभीत हो गए और किसानों के मवेशियों और खेतों को कुर्क करने लगे। परंतु किसान अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। उन्हें और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए महात्मा गांधी ने किसानों से कहा कि जो खेत कुर्क किया जा रहा है उस खेत से वे अपनी फसल काट लाएं। गांधी जी के इस आदेश का पालन करने के लिए मोहनलाल पंड्या आगे आये और वे एक खेत से प्याज की फसल उखाड़ लाए। मोहनलाल पंड्या के इस कार्य में कई किसानों ने उनकी सहायता भी की थी। प्याज की फसल उखाड़ने के कारण वे सभी पकड़े गए, और उन पर मुकदमा भी चलाया गया और उन्हें सजा भी हुई। इस तरह से किसानों का यह आंदोलन आगे बढ़ा। किसानों की एकजुटता को देखकर सरकार को यह एहसास हुआ कि उनसे बहुत बड़ी भूल हो गई परंतु वे अपनी भूल को स्वीकार नहीं करना चाहते  थे। अंतत: सरकार ने बिना कोई सार्वजनिक घोषणा किए ही गरीब किसानों से लगान की वसूली बंद करवा  दी। सरकार ने यह कार्य बहुत देर से किया और मजबूरी में किया। सरकार चाहती थी की  किसानों को किसी भी तरह से यह पता न होने पाए कि सरकार ने उन  के आंदोलन से झुककर किसी भी प्रकार का कोई समझौता किया है। इस आंदोलन से  किसानों को ज्यादा लाभ तो नही हुआ परंतु उनकी नैतिक विजय जरूर हुई।  (Kheda movement)

satyagraha in hindi 

खिलाफत आंदोलन

खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement) के महत्वपूर्ण तथ्य-

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन और उनके सहयोगियों द्वारा तुर्की पर किए गए अत्याचारों के विरोध स्वरूप सितंबर 1919 ईस्वी में "अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी" का गठन किया गया और अंग्रेजो के विरुद्ध खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement) प्रारंभ किया गया। नवंबर 1919 ईस्वी में कांग्रेस और मुस्लिम लीग का साथ साथ  दिल्ली में अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन हुआ जिसमें गांधीजी को सर्वसम्मति से सम्मेलन का अध्यक्ष चुना गया।  इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि अगर सरकार उनकी मांगों को मानने से इंकार करती है तो सरकार के साथ सहयोग करना बंद कर दिया जाएगा। तिलक एवं महात्मा गांधी सहित तमाम कांग्रेसी नेताओं ने भी खिलाफत आंदोलन को अपना पूरा समर्थन दिया तथा इसे हिंदू और मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने का सुनहरा अवसर माना गया। जून 1920 में इलाहाबाद में सर्वदलीय सम्मेलन हुआ जिसमें स्कूलों कालेजों एवं अदालतों के बहिष्कार का निर्णय किया गया। मदन मोहन मालवीय ने खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement) का समर्थन नहीं किया था और हकीम अजमल खान ने  खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement) के दौरान "हाजिक-उल-मुल्क" की पदवी त्याग दी थी।

असहयोग आंदोलन

असहयोग आंदोलन (Asahyog Andolan)

असहयोग आंदोलन से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य-


लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुए कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित करवाया था। 

गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन (Asahyog Andolan) 1 अगस्त 1920 ईस्वी को प्रारंभ किया गया था। 

असहयोग आंदोलन (Asahyog Andolan) पश्चिमी भारत बंगाल तथा उत्तरी भारत में पूर्ण रूप से सफल रहा था। 

शिक्षा संस्थाओं का असहयोग आंदोलन (Asahyog Andolan) के समय सर्वाधिक बहिष्कार बंगाल में हुआ था। 

असहयोग आंदोलन के दौरान अनेक वरिष्ठ वकीलों (मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, सरदार वल्लभभाई पटेल, पंडित जवाहरलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद आदि) ने न्यायालय का बहिष्कार किया और इस आंदोलन में भागीदारी की थी। 

इस आंदोलन के दौरान गांधीजी ने अपनी "कैसर-ए-हिंद" की उपाधि वापस कर दी थी। 

फरवरी 1922 में गांधी जी ने वायसराय को एक पत्र लिखकर धमकी दी कि यदि 1 हफ्ते के अंदर सरकार की उत्पीड़न नीतियां वापस नहीं ली गई तो व्यापक सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ कर दिया जाएगा। 

गांधी जी की वायसराय को दी गई धमकी की अवधि पूरी होने से पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थित चौरी चौरा नामक स्थान पर 5 फरवरी,1922 ईस्वी  को आंदोलनकारी भीड़ ने पुलिस के 22 जवानों को थाने  के अंदर जिंदा जला दिया। इस घटना से गांधी जी को अत्यंत आहत हुआ और उन्होंने 12 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन को समाप्त घोषित कर दिया। 

आंदोलन (Asahyog Andolan) समाप्त होते ही सरकार ने 10 मार्च 1922 ईस्वी को गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया तथा असंतोष भड़काने के अपराध में 6 वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई। 

असहयोग आंदोलन (Asahyog Andolan) की समाप्ति के पश्चात मार्च 1923 ईस्वी में मोतीलाल नेहरू तथा सी.आर. दास ने इलाहाबाद में स्वराज पार्टी की स्थापना की। 

सितंबर 1923 ईस्वी  में मौलाना आजाद के नेतृत्व में हुए कांग्रेश के विशेष अधिवेशन में स्वराज पार्टी को मान्यता प्रदान की गई। 

स्वराज पार्टी की राजनीति के फलस्वरूप ही भारतीयों को सर्वप्रथम सांसद बनने का गौरव प्राप्त हुआ। 

1925 ईस्वी में विट्ठल भाई पटेल का केंद्रीय विधानमंडल में चुना जाना स्वराजियों  की महत्वपूर्ण उपलब्धियां थी। 

1923-24 ईस्वी में नगर पालिकाओं और स्थानीय निकायों के हुए चुनाव में इन्हें विशेष सफलता प्राप्त हुई थी। कोलकाता के मेयर सी. आर. दास, अहमदाबाद के मेयर विट्ठल भाई पटेल, पटना के राजेंद्र प्रसाद और इलाहाबाद के पंडित जवाहरलाल नेहरू निर्वाचित हुए थे। 

महात्मा गांधी के आंदोलन

भारत छोड़ो आंदोलन

भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य-

7 अगस्त 1942 ईस्वी को मुंबई के ग्वालिया टैंक के मैदान में कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित किया गया। जिसकी अध्यक्षता मौलाना अब्दुल आजाद कर रहे थे। 

इस अधिवेशन में 8 अगस्त को "भारत छोड़ो आंदोलन" के प्रस्ताव को पास कर दिया गया और गांधी जी के नेतृत्व में एक जन संघर्ष चलाने का निर्णय लिया गया। 

भारत छोड़ो (Quit India Movement) प्रस्ताव का आलेख गांधी जी ने तैयार किया था, जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्तुत किया और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इसका समर्थन किया था। 

इस आंदोलन में ही गांधी जी ने "करो या मरो" का नारा दिया था। 

9 अगस्त की सुबह "ऑपरेशन जीरो आवर" के साथ गांधीजी को गिरफ्तार कर आगा खां पैलेस में रखा गया तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू, गोविंद बल्लभ पंत, जे.बी. कृपलानी, पट्टाभि सीतारमैया आदि  को गिरफ्तार कर अहमदनगर जेल में रखा गया। 

राजेंद्र प्रसाद को पटना तथा जय प्रकाश नारायण को हजारीबाग सेंट्रल जेल में रखा गया। बाद में जयप्रकाश नारायण ने जेल से फरार होकर नेपाल में आजाद दस्ते का गठन किया तथा भूमिगत होकर आंदोलन चलाते रहे। 

Gandhi Andolan

राम मनोहर लोहिया रेडियो पर नियमित रूप से बोलते थे। गुप्त रेडियो संचालन से जुड़े अन्य नेता-वी. एम. खाकर, उषा मेहता, चंद्रकांत झावेरी आदि थे। 

अरुणा आसफ अली इस आंदोलन के दौरान भूमिगत क्रियाकलापों से जुड़ी रहीं। 

भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement)  के दौरान देश के कुछ हिस्सों में समानांतर सरकार की स्थापना हुई। चित्तू पांडे के नेतृत्व में बलिया में समानांतर सरकार का गठन किया गया। बंगाल के मिदनापुर जिले के तामलुक नामक स्थान पर जातीय सरकार की स्थापना की गई। तामलुक की जातीय सरकार ने बड़े पैमाने पर राहत कार्य किये। स्कूलों को अनुदान तथा एक सशक्त विद्युत वाहिनी का गठन भी इसमें शामिल है। 

हिंदू महासभा एवं मुस्लिम लीग ने भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया था। 

अमेरिकी पत्रकार तथा महात्मा गांधी के जीवनीकार लुई फिशर भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) के दौरान महात्मा गांधी के साथ रहे। 

Satyagraha Movement 

गांधी जी ने जेल से छूटने के बाद रचनात्मक कार्यों का सहारा लेकर पुनः सक्रियता दिखाई। संघर्ष की संभावना से भयभीत होकर सरकार ने वेवेल योजना प्रस्तुत की। (Quit India Movement)